Friday, March 29, 2013

जननी सुरक्षा योजना का भौतिक एवं वित्तीय प्रदर्शन


ग्रामीण क्षेत्रों में 600 रुपए प्रति प्रसव
वर्ष 2005-06 से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एऩआरएचएम) के तहत जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) नामक राष्ट्रीय योजना चलाई जा रही है। इस योजना का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव की व्यवस्था में सुधार कर शिशु और मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाना है। इस योजना के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को 8 ईएजी राज्यों (जैसे बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) तथा जम्मू एवं कश्मीर और असम में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधा केन्द्रों में प्रसव पर नकद सहायता उपलब्ध कराई जाती है। अन्य राज्यों में वैसी गर्भवती महिलाएं जो गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की श्रेणी में तथा वैसी महिलाएं जो अनुसूचित जाति (आ.जा.) तथा अनुसूचित जनजाति (आ.ज.जा.) श्रेणी में हों और उनका संस्थागत प्रसव स्वास्थ्य केन्द्र में होता है तो उन्हें शर्तानुसार नकद हस्तांतरण की सुविधा प्राप्त होगी।
वर्ष 2005-06 के अंतर्गत 7.39 लाख गर्भवती महिलाओं को इसका लाभ मिला है और जेएसवाई ने वर्ष 2011-12 में लगभग 109.37 लाख गर्भवती महिलाओं को नकद सहायता उपलब्ध कराकर एक आकर्षक सफलता अर्जित की है। इसी प्रकार इस योजना के तहत वित्तीय व्यय वर्ष 2005-06 के 38 करोड़ रूपए की तुलना में कई गुना बढ़कर वर्ष 2011-12 में 1,552.85 करोड़ रुपए हो गया है।
जेएसवाई का भौतिक एवं वित्तीय प्रदर्शन इस प्रकार रहा-
वर्ष
लाभार्थियों की संख्या
(लाख में)
व्यय
(करोड़ में)
2005-06
7.39
38. 29
2006-07
31.58
258. 22
2007-08
73.29
880. 17
2008-09
90. 37
1241. 33
2009-10
100.78
1473.76
2010-11
106.96
                1618.39
2011-12
109.37
1606.18
2012-13
80.68*
1155.00*
*वर्ष 2012-13 के दिसंबर, 2012 तक भौतिक एवं वित्तीय उपलब्धि।
सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने के लिए इस पहल ने समुदाय आधारित स्वास्थ्य स्वयं सेवकों की पहचान की है, जिसमें एएसएचए (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) हैं, वे स्वास्थ्य प्रणाली और समुदायों के बीच एक कड़ी का काम करेंगी। देश में 8 लाख से ज्यादा एएसएचए स्वयं सेवक कार्य कर रहे हैं। इस योजना को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में एएसएचए कार्यकर्ताओं की निष्पादन आधारित प्रोत्साहन राशि में वृद्धि की गई है, जो निम्नलिखित है-
·        ग्रामीण क्षेत्रों में 600 रुपए प्रति प्रसव। जन्मपूर्व घटक के लिए 300 रुपए (कम से कम 3 एएनसी) तथा 300 रुपए संस्थागत प्रसव की सुविधा प्रदान करने के लिए ]
·        शहरी क्षेत्रों में 400 रुपए प्रति प्रसव। जन्मपूर्व घटक के लिए 200 रुपए (कम से कम 3 एएनसी) तथा 200 रुपए संस्थागत प्रसव की सुविधा प्रदान करने के लिए ]
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मीणा/आनन्द/शदीद-1626

महिलाओं के लिए अलग नगर बस सेवा

28-मार्च-2013 15:21 IST
केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने राज्य सरकारों को 10 लाख की आबादी वाले शहरों में महिलाओं के लिए अलग से नगर बस सेवा के प्रावधान की समीक्षा करने के संबंध में हाल ही में परामर्श जारी किया है। मंत्रालय ने सभी नगरीय बसों, जेएनएनयूआरएम तथा गैर जेएनएनयूआरएम बसों में "शहरी बस विनिर्देश" के अनुसार गुणवत्तापूर्ण परिवहन प्रणाली (आरटीएस) विनिर्देश के क्रियान्वयन के संबंध में राज्यों को परामर्श भी जारी किया है। तिपहिया वाहनों तथा टैक्सियों में जीपीएस/जीपीआरएस के जरिए वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ-साथ सामान्य नियंत्रण केन्द्र के जरिए प्रबंधन के संबंध में कार्यवाही शुरू करने का परामर्श राज्यों को दिया गया है, ताकि यह प्रणाली यात्रियों के लिए बेहतर और सुरक्षित हो सके। 

जेएनएनयूआरएम के तहत विभिन्न शहरों में स्वीकृत की गई बसों की खरीद "शहरी बस विनिर्देश (यूबीएस)" के अऩुसार होनी चाहिए। केन्द्र सरकार द्वारा जारी अंश जो कि अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता है, वह इन प्रणालियों के खरीद तथा मंत्रालय को सौंपे जाने वाले खरीद आदेश से जुड़ा है। जेएनएनयूआरएम के तहत इन प्रणालियों का कार्यान्वयन/खरीद 31 मार्च, 2014 तक बढ़ा दिया गया है। 
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मीणा/आनन्द/शदीद-1627

Wednesday, March 27, 2013

महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता

26-मार्च-2013 17:53 IST
राज्‍य सरकारों को बढ़ावा देने की सलाह 
विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग ने परिसरों में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता और उनकी सुरक्षा के लिए कार्यबल गठित किया 
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राज्‍य सरकारों को महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देने की सलाह दी है। इसमें पाठ्यक्रम तथा पाठ्य पुस्‍तकों का दोबारा निरीक्षण करना, महिलाओं के प्रति सकारात्‍मक सामग्री शामिल करते हुए उन्‍हें बेहतर बनाना तथा शिक्षकों को सालाना प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान कम से कम दो या तीन दिन तक महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देने संबंधी मॉड्यूल को शामिल करना जैसे कदम शामिल हैं। मंत्रालय ने यह भी सलाह दी है कि स्‍कूल निगरानी प्रणालियां ऐसे मानकों की जांच सूची शामिल करें,जो कक्षा में पढ़ाई तथा स्‍कूल की अन्‍य गतिविधियों के दौरान महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा दे सकें। 

विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग-यूजीसी ने परिसरों में महिलाओं की सुरक्षा के उपायों तथा महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता से संबंधित कार्यक्रमों की समीक्षा करने के लिए जनवरी 2013 में एक कार्यबल का गठन किया था। इस कार्यबल को परिसरों में लड़कियों तथा महिलाओं की सुरक्षा के लिए वर्तमान में किए जा रहे प्रबंधों का जायजा लेने का भी अधिकार दिया गया है। 

केन्‍द्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड -सीबीएसई शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए तथा छात्रों में छोटी उम्र से ही महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता जगाने संबंधी मॉड्यूल तैयार कर रहा है। 

पहली से दसवीं कक्षा के लिए स्‍वास्‍थ्‍य और शारीरिक शिक्षा विषय का राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद-एनसीईआरटी की ओर से तैयार किया जा रहा पाठ्यक्रम राष्‍ट्रीय पाठ्यक्रम प्रारूप-एनसीएफ 2005 पर आधारित हैं, जिसमें आत्‍मरक्षा से जुड़े विषयों को शामिल किया गया है। 

नैतिक शिक्षा और महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता को स्‍कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रयास भी किए गये हैं। 
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वि.कासोटिया/रीता/मधुप्रभा-1615

Tuesday, March 19, 2013

पूर्व राष्‍ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल पर पुस्‍तक

19-मार्च-2013 19:23 IST
उप राष्‍ट्रपति ने किया पुस्‍तक का लोकार्पण 
उप राष्‍ट्रपति श्री एम हामिद अंसारी ने कहा है कि हमारे देश ने अनेक महिला नेता दिए हैं जिन्‍होंने समाज पर अमिट छाप छोड़ी है लेकिन यह दुखद है‍कि हम अक्‍सर महिलाओं को समान नागरिक के रूप में नहीं देखते और उनके मानवीय अधिकारों की ही अनदेखी करते हैं। 

उप राष्‍ट्रपति ने यह बात पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल पर लिखी पुस्‍तक का लोकार्पण कर रहे थे। इस पुस्‍तक का शीर्षक है : फस्‍ट वुमन प्रेसीडेंट आफ इंडिया, रिइनवेंटिंग, लीडरशिप, श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल। इस पुस्‍तक की लेखिका हैं, इंग्लिश एंड फारेन लैंग्‍वेज यूनिवर्सिटी हैदराबाद की कुलपति प्रोफेसर सुनैना सिंह। 

उप राष्‍ट्रपति ने कहा कि पूर्व राष्‍ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का जीवन और कार्य नागरिकों के लिए प्रेरणा स्रोत और उदाहरण योग्‍य है। श्रीमती पाटिल ने सार्वजनिक सेवा सम्‍मान और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ की। भारत के राष्‍ट्रपति के रूप में उन्‍होंने उच्‍चतम पद का निर्वहन करते हुए संविधान की मर्यादाओं का पालन किया और प्रतिबद्ध रूप से देश के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए कार्य किया। 

उप राष्‍ट्रपति श्री हामिद अंसारी ने पुस्‍तक की लेखिका प्रोफेसर सुनैना सिंह के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि पुस्‍तक न केवल प्रथम महिला राष्‍ट्रपति की आत्‍मकथा है बल्कि पुस्‍तक से देश की विभिन्‍न समस्‍याओं की भी जानकारी मिलती है। 

वि. कासोटिया/गांधी/दयाशंकर – 1468

Monday, March 11, 2013

INDIA: मध्य प्रदेश सरकार की महिला नीति:

बाढ़ की संभावनाओं पर घर बनाने का जतन         --प्रशान्त कुमार दूबे
An Article by the Asian Human Rights Commission
बाढ़ की संभावनायें सामने हैं, और नदियों के किनारे घर बने हैं।
मशहूर शायर दुष्यंत कुमार का यह शेअर प्रदेश में घनघोर जल्दबाजी में की जा रही एक कसरत पर मौजूं है | देश में पहली बार महिला नीति बनाने का तमगा हासिल करने वाले और विगत एक साल से बगैर महिला नीति के सांसे भरते मध्यप्रदेश में नई महिला नीति को बनाने की कवायद जोर-शोर से चल रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग और प्रशासन अकादमी की महिला शाखा इस पर कसरत कर रही है। पर यह सब बहुत ही जल्दबाजी में हो रहा है। क्यूंकि खबर है कि प्रदेश के घोषणावीर मुख्यमंत्री इस नीति को अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर लागू कर इसे भुनाना चाहते हैं। यह जनसंपर्क विभाग का एक महत्वपूर्ण काम है कि चुनावी साल में दिवसों की महत्ता को जम कर भुनायें और कमोबेश वही हो रहा है। बहरहाल जल्दबाजी में बन रही इस महिला नीति के काफी उथले होने के आसार हैं। यह नीति यदि 8 मार्च को लागू नहीं की गई तो भी मार्च में यह लागू हो ही जायेगी |
प्रदेश सरकार के साथ एक जुमला साथ चलता है कि गलती करना और उसे दोहराते रहना | यह महिला नीति के साथ भी हो रहा है | ज्ञात हो कि मध्यप्रदेश की महिला नीति 2008-12 तैयार की गई थी जिसका लक्ष्य विकास की मुख्य धारा में महिला की गरिमापूर्ण भागीदारी सुनिश्चित कर उसके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित नीतियों का परिणाममूलक क्रियान्वयन करना रखा गया। इस महिला नीति में महिलाओं के घटते लिंग अनुपात,बालिका भ्रूण हत्या की रोकथाम, महिलाओं के प्रति हिंसा, महिलाओं व किशोरी बालिकाओं की शिक्षा व गुणात्मक स्वास्थ्य सेवायें, प्रत्येक स्तर पर निर्णय प्रक्रिया एवं व्यवस्था में भागीदारी, जेण्डर पर आधारित बजट व्यवस्था तथा नीतिगत प्रावधानों की मानिटरिंग, मूल्याकंन और प्रतिवेदन को शामिल किया गया था । पर एसा कुछ हुआ नहीं और नयी नीति की तैयारी चालू हो गयी है |
आइये जरा पिछली नीति के कुछेक वायदों और आज के हालात पर गौर करें | अव्वल तो यही कि बलात्कार और छेड़छाड़ के मामलों में मध्यप्रदेश पिछले 10 वर्षों से पहले स्थान पर है | इस कलंक को धोने के लिए पिछली नीति में प्रदेश के प्रत्येक पुलिस थानों में महिला पुलिस अधिकारी की नियुक्ति करना था, जो आज तक नहीं हुई। ट्रेफिकिंग को रोकने के लिये निगरानी व्यवस्था बनाई जानी थी जो बनी नहीं, बल्कि ट्रेफिकिंग पिछले पांच सालों में और बढ़ी है। केवल पिछले सात सालों में ही 8108 बालिकाओं की गुमशुदगी दर्ज है | हालाँकि अभी 2 माह पहले जरूर एक हेल्पलाइन बनी है जो स्वागत योग्य कदम है लेकिन वह भी दिल्ली प्रकरण से उपजे चौतरफा दवाब का नतीजा है |
पिछली नीति में महिलाओं के भू अधिकारों के संदर्भ में समानाधिकार दिये जाने पर जोर दिया गया था, लेकिन इसी राज्य सरकार ने महिलाओं के नाम पर रजिस्ट्री करने पर 1 प्रतिशत शुल्क की छूट के प्रावधान तक को खत्म कर दिया गया। इसके लिए कानून भी बनाया जाना था, पर कोई बात आगे नहीं बढ़ी। एनएफएचएस-3 के अनुसार 56 फीसदी खून की कमी वाली महिलाओं के प्रदेश में किशोरी स्वास्थ्य को बेहतर करने और पोषण देने की बात कही गई थी लेकिन अभी भी यह सरकार हर गांव में केवल दो ही किशोरी बालिकाओं को पोषण आहार उपलब्ध करवा रही है, ना कि सभी बालिकाओं को । सबला योजना(केंद्र प्रवर्तित) भी प्रदेश के 15 जिलों तक सीमित है बाकी 35 जिलों के लिए कुछ नहीं।
नीति यह भी कहती थी कि गर्भकाल में महिलाओं से मेहनत करवाने से ठेकेदार पर कार्यवाही होगी। परन्तु आज तक एक भी ठेकेदार के खिलाफ प्रदेश में कोई कोई भी कार्यवाही नहीं हुई बल्कि गर्भवती महिलायें तो मनरेगा जैसे सरकारी कार्यक्रमों में ही काम करती पाई जा रही हैं। इस पूरे मसले पर महत्वपूर्ण था कि हर साल महिलाओं की स्थिति पर नवीन आंकड़ों और राज्य स्तर पर उठाये जा रहे कदमों के संबंध में एक स्थिति पत्र बनाने और उसे सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग की थी, लेकिन अब तक यह पत्र एक बार भी नहीं निकला है। क्रियान्वयन की निगरानी इसी विभाग के पास थी लेकिन निगरानी हुई होती तो शायद हमें यह मर्सिया गाने की जरूरत थी ही नहीं।
हां कुछ हुआ है तो वह है पंचायती राज्य एवं शहरी निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण। यह काबिल-ए-गौर है और इसलिये सरकार बधाई की पात्र है लेकिन यह भी देखना सरकार का ही काम है कि उन जनप्रतिनिधियों की क्षमतावृद्धि कैसे की जाये ताकि वे बेहतर काम कर सकें। इसी प्रकार बालिका भ्रूण हत्या की रोकथाम और बालिका शिक्षा पर तो ध्यान दिया जा रहा है पर बालिकायें स्कूल क्यों छोड़ती हैं उस पर ज्यादा कसरत नहीं हुई है।
सरकार ने यह भी कहा था कि गरीबी परिवारों की बालिकाओं को विवाह में विशेष सहायता दी जायेगी। सरकार ने इसके लिये प्रावधान तो बढ़-चढ़कर किये पर कन्या को दान की वस्तु समझते हुये ‘कन्यादान’ योजना लागू कर दी। ‘कन्यादान’ शब्द यदि राज्य उपयोग करता है तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति नहीं होगी। समझ से परे यह भी है कि एक राज्य महिला नीति बनाते समय महिलाओं को समता, समानता, गरिमा व क्षमताओं के साथ महिला को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की बात करता है लेकिन दूसरी ओर उसी महिला की गरिमा के साथ खिलवाड़ करते हुये कन्यादान योजना लागू करता है। खबर यह भी है कि नई महिला नीति का प्रारुप भी इस पर मौन है और नीति नियंता भी।
तो सवाल यह है कि यदि पिछली नीति के क्रियान्वयन का यह स्तर है तो क्या यह माना जाये कि यह नीतियां महज रस्मअदायगी ही होती हैं ताकि यदि विकास के तराजू पर तौला जाये तो राज्य कह सके कि हमने महिला नीति बनाई है। पिछली महिला नीति 2008-2012 में सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान किये थे पर छः साल बाद भी ढांक के तीन पात, तो फिर ऐसी नीति का क्या औचित्य .....? क्या यह नीतियां दिखावे या वेबसाईट पर शोभा बढ़ाने के काम आती हैं ताकि जब गूगल पर सर्च किया जाये तो टप से उछल कर महिला नीति, मध्यप्रदेश सामने आ जाये और महिलाओं के हक में मध्यप्रदेश का यशगान गाया जा सके। सवाल तो यह भी है कि क्या यह नीतियाँ मुख्यमंत्री और प्रशासन के खम ठोंकने के काम ही आती हैं या संदर्भित समूह के उत्थान की वास्तविक चिंता भी समाहित होती है। जवाब है नहीं। क्यूंकि यदि नीतियों और उनके प्रावधानों को सरकार गंभीर मानती तो फिर पिछले एक साल से प्रदेश में तो नीति ही नहीं है तो सरकार इतनी कछुआ चाल से क्यूँ रेंगती रही ? अब जबकि दिल्ली प्रकरण से देश भर में बने माहौल से प्रदेश सरकार की लुटिया भी ना डूबने लगे तो सरकार आनन-फानन में यह नीति बनाने पर विचार कर रही है |
प्रदेश के तमाम महिला संगठनों ने इन सभी मुद्दों पर अपनी तल्ख़ टिप्पणी करते हुये यह मांग की है कि ना केवल बेहतर नीति बनाई जाये बल्कि पुरानी महिला नीति के प्रावधानों और उनके हश्र को ध्यान में रखते हुये सरकार उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित करने का खाका भी खींचा जाए। प्रदेश के करीब 20 संगठनों ने महिला नीति को लेकर व्यापक सुझाव भी राज्य सरकार को सौंपे हैं | नागरिक अधिकार मंच की उपासना बेहार कहती हैं कि सरकार को इतनी जल्दबाजी की बजाय प्रस्तावित महिला नीति को जनमंचों पर लाना चाहिये, ताकि उस पर गंभीर चर्चायें हों और उसके बाद ही सरकार आगे बढ़े । इससे हटकर एक बड़ा सवाल कि सरकार जो नीति में लिखेगी, वो अपनाने के लिये कितना तैयार है, यह भी वह बताये । देखना यह भी होगा कि पिछली बार के नीति दस्तावेज की प्रथम पंक्ति की तरह सरकार इस बार भी महिला को प्रकृति की सबसे सुंदर कृति बतायेगी या महिला को सुन्दर और कुरुप की छवि से बाहर निकलकर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व मानेगी और उसे आगे लाने के प्रयास भी करगी।
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About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com
About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Wednesday, March 6, 2013

क्या सच में हम ऐसा ही समाज चाहते हैं?

Wed, Mar 6, 2013 at 3:09 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission
INDIA: स्त्री विरोधी नहीं हो सकते सभ्य समाज--शिशिर कुमार यादव
पिछले कई दिनों से देश भर में,समाज द्वारा महिलाओं के प्रति अपराधों के घिनौने रूप पर एक चर्चा और विमर्श का माहौल हैं. अफ़सोस यह कि यह माहौल किसी आत्मचेतना के चलते नहीं बल्कि एक निर्मम बलात्कार और हत्या से उभरे जनाक्रोश के चलते बना है. इस घटना के लगभग दो महीने के बाद भी न समाज शर्मिन्दगी से उबार पाया है न उसी समाज के एक हिस्से के लोग दरिंदगी से और हमारा हासिल वह समाज है जिसमें एक महिला अपनी प्राकृतिक जीवन यात्रा इसलिए पूरी नहीं कर सकती क्योंकि समाज नहीं चाहता था कि वह इस तरह सें जिएं.
इस खबर के बाद गलतियों और खामियों के सामाजिक और राजनैतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं, जिनकी अपनी ही प्रकृति और सीमा होगी. लेकिन फिर भी यह हत्या, जो न केवल निर्मम बल्कि बडे सधे तरीके से भी की हैं उस ओर सोचना जरूरी हैं कि क्या सच में हम एक सभ्य समाज में जी रहे हैं? क्या सच में हम ऐसा ही समाज चाहते हैं? इस मौत को क्या कहा जाए? हादसा, अपराध, दुर्घटना या कोई और शब्द. शायद किसी भी शब्द में इतनी ताकत हो जो इसे पूरी तरह से विश्लेषित कर सकें. वस्तुतः देखें तो इस हादसे के सन्दर्भ में भाषा की सीमा भी साफ दिखती हैं क्योंकि सिर्फ हादसा कहने से ऐसे अपराधों की गंभीरता और वीभत्सता का मौलिक चरित्र ही खत्म हो जाता हैं.
Photo  courtesy:Indian Pics
अफ़सोस यह भी है कि ऐसे निर्मम अपराधों के बाद तमाम लोग ऐसे अपराधियों के लिए मौत की सजा माँगने लगते हैं जैसे मृत्युदंड से इस समस्या का समाधान हो जाएगा. पर मृत्युदंड ने दुनिया के किसी भी हिस्से में अपराध रोके हों इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता. एक दूसरे स्तर पर भी देखें तो समझ आता है कि अगर मौत की सजा इन दुष्कृत्यो को रोक सकती तो एक अपराधी को ऐसी सजा मिलने के बाद अपराधी और समाज दोनो ही इसकी पुनरावृत्ति नहीं करते. इन हादसों की पुनरावृत्ति हमें यह बतलाती हैं कि अब भी हम ना तो इनकी गंभीरता समझ पाए हैं और ना ही वीभत्सता. हाँ मौत की सजा देने से यह जरूर होगा कि बलात्कारी सबूत न छोड़ने के प्रयास में पीड़ित की हत्या करने पर उतर आयें.
जो भी हो पर इस हादसे ने हमें एक बार खुद की ओर सोचने के लिए झकझोरा हैं कि हम कैसे सामाजिक औऱ राजनैतिक ढाचें में जी रहे हैं? हम एक ऐसे समाज रह रहे हैं जिसमे आधी दुनिया की भागीदार स्त्री के मूलभूत अधिकारों को हम सभ्यता के हजारों साल आगे आने के बाद भी बर्बर तरीके से कुचलता जाता रहा है. हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसमे महिलाओं के प्रति इस बर्बरता को जिंदा रखनें के लिए चरणबद्ध तरीको से जाल बुने जाते हैं और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों की फेहरिश्त उनके परिवारों से ही शुरू हो जाती है. भ्रूण हत्या, परिवार के अन्दर यौन हिंसा, दहेज़, दहेज़ हत्या, ध्यान से देखें तो यह सब स्त्रियों के विरुद्ध उनके द्वारा किये जाने वाले अपराध हैं जो अन्यथा उनके बचाव के लिए जिम्मेदार हैं. 

कहने की जरूरत नहीं है कि हम जिस देश में रह रहें हैं उसमें इन अपराधों को सामाजिक और राजनैतिक मान्यता की अदृश्य शक्ति मिली हुई हैं. हम और आप इन्हे पहचानते और जानते भी हैं औऱ कई बार इनके हिस्से भी होते हैं पर बदलते नहीं हैं. हमें इनसे दिक्कत सिर्फ तब होती है जब यह हमारे अपनों के साथ हों. हाँ, ऐसे अपराधों के बाद आने वाली प्रतिक्रियायों पर नजर डालने से इन अपराधों को मौन स्वीकृति दिलाने वाले चेहरे भी साफ़ नजर आने लगते हैं. दिल्ली के इस मामले के बाद समाज और सार्वजनिक मंचो से बयान उसकी बानगी हैं। और इसी लिए यह पूछना जरूरी बनता है कि ऑनरकिलिंग को भावनात्मक और सामाजिकता से जुड़ा मुद्दा माननें वाले औऱ चुपचाप भ्रूण हत्या को बढावा देने वाले समाज से, इस हत्या पर ईमानदारी भरी प्रतिक्रिया औऱ बदलाव की उम्मीद करना कहां तक समझदारी भरा कदम होगा.

अफ़सोस यह भी है कि समाज संस्कृति के उद्घोषक जो इस देश को " कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी से" विविधता भरी संस्कृति का वर्णन कर अपना सीना चौड़ा करते हैं वे भी यह भूल जाते हैं कि महिलाओं को लेकर लगभग पूरा देश एक ही तरह का व्यवहार करता है. क्या उत्तर क्या दक्षिण, क्या राजस्थान क्या बंगाल, क्या शिक्षित क्या अशिक्षित, महिलाओं के प्रति अपराध और उनके अधिकारों के प्रति रवैया लगभग एक सरीखा और एक समान हैं. देश का कोई कोना दंभ से इसका दावा नही कर सकता हैं कि वह इन स्थितियों और परिस्थितियों से खुद को इतर रखे हुए हैं. स्पष्ट हैं कि महिलाओं के प्रति नजरिये को लेकर आजतक हमारा समाज जहां था वहीं हैं और अगर कुछ बदलाव के चिन्ह दिखाई भी पडे हैं तो उन्हे कुचलनें के लिए समाज ने अपराधियों को हमेशा बढ़ावा दिया हैं. जिससे उनकी नैतिकता और सभ्यता की खोखली पाठशाला का पाठ महिलाएं आसानी से समझ लें. आज भी समाज, नारी देह और उसकी स्वतंत्रता को अपने पैमानो से देखता हैं और आगे भी उसे नियंत्रित करने का प्रयास जारी हैं. इन कोशिशों में अपराधी और अपराध को मौन सहमति देकर आगे भी नियंत्रित करना चाहता हैं. इसीलिए सामाजिक व्यवस्था का कोई भी परिवर्तन, आज भी अलोकतांत्रिक तरीके से ही कुचला जाता हैं. राजनैतिक और सामाजिक संस्थाए इनको न केवल बढ़ावा देती हैं वरन कई बार अगुवाई भी करती नजर आती हैं.

निश्चित ही कोई भी समाज या व्यवस्था आदर्श नहीं होती हैं, अच्छे और बुरे गुण सभी सामाजिक व्यवस्था के हिस्से होते हैं. भारतीय सामाजिक व्यवस्था उससे इतर नहीं हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं के प्रति समाजीकरण की वह व्यवस्था जिसमें उनके प्रति किए गए अपराध जो कि सामाजिक अपराध हैं और समाज का हिस्सा रहे है. इनका इतिहास बर्बर काल सें हैं और आज भी अनवरत जारी हैं. आज भी हम ऐसे ही समाज को पाल पोस रहे हैं जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति पूर्णतया असंवेदनशील हैं. इस कदर की असंवेदनशीलता और अपराध को बढावा देना किसी भी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं होता हैं. ऐसे में हमारा दावा कितना खोखला हैं कि हम एक सभ्य समाज में हैं और हमारे द्वारा एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा रहा हैं.
About the Author: Mr. Shishir Kumar Yadav is a research scholar based in Jawaharlal Nehru University, New Delhi. He could be contacted at shishiryadav16@gmail.com
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

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Tuesday, March 5, 2013

महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग

05-मार्च-2013 12:59 IST
श्रीमती कृष्णा तीरथ ने आयोग के 57वें सत्र में हिस्सा लिया

महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ ने कल न्यूयॉर्क में महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के 57वें सत्र में शिरकत की और उच्च स्तरीय गोलमेज चर्चा में हिस्सेदारी की। ‘महिलाओं और लड़कियों के प्रति हिंसा के सभी रुपों का उन्मूलन और रोकथाम’ इस वर्ष का विषय था। 
प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए मंत्री महोदया ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों के प्रति हिंसा मानवाधिकार उल्लंघनों के व्यापक रुपों में से एक है जो महिलाओं को निजी तथा सार्वजनिक जीवन दोनों में सम्मानजनक जिंदगी के अधिकार से वंचित करता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के प्रति हिंसा के ताजा घटनाक्रम के मद्देनजर भारत सरकार महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित मुद्दे को समग्र दृष्टिकोण के साथ उच्चतम स्तर पर वरीयता दे रही है। इसके तहत निवारक और उपचारात्मक पहलुओं को संतुलित करने तथा लडकियों/महिलाओँ की सुरक्षा के लिए विभिन्न कानूनों और प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन पर बल दिया जा रहा है। 

श्रीमती तीरथ ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 तथा संसद द्वारा हाल में पारित कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2013 का खास तौर पर जिक्र करते हुए महिलाओं के प्रति हिंसा को दूर करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न विधायी कदमों की जानकारी दी। उन्होंने महिलाओं के प्रति यौन अपराध करने वाले आरोपियों के लिए सुनवाई में तेजी और ऐसे अपराधियों को कड़ी सज़ा दिलाने के लिए मौजूदा आपराधिक कानूनों की समीक्षा तथा संशोधन की संस्तुतियों के वास्ते गठित न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि आपराधिक कानूनों में बदलाव की ज़रुरतों को देखते हुए सरकार ने 3 फरवरी 2013 को आपराधिक कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश पेश किया जिसमें न्यायमूर्ति वर्मा समिति की कुछ संस्तुतियों को शामिल किया है तथा संबद्ध पक्षों के विचारों को भी ध्यान में रखा गया है। इसके अलावा उन्होंने सरकार द्वारा उठाए गए अन्य कदमों की भी जानकारी दी। 

श्रीमती तीरथ ने बताया कि महिला और बाल विकास मंत्रालय नागरिक समाज संगठनों, महिला कार्यकर्ताओं ,कानूनी विशेषज्ञों, विधि विशेषज्ञों समेत राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संगठनों से महिला सुरक्षा को बढ़ावा देने के मुद्दे पर संबद्ध पक्षों से परामर्श कर रहा है। 

वि.कासोटिया/विजयलक्ष्मी-1036

Saturday, March 2, 2013

आंगनवाडी केंद्र

01-मार्च-2013 19:46 IST
31 जनवरी, 2013 की स्‍थिति के अनुसार 13.72 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों/मिनी आंगनवाड़ी केंद्रों की मंजूरी दी गई थी। इनमें से 13.31 लाख आंगनवाड़ी एवं मिनी आंगनवाडी केंद्र परिचालन में है। ये केंद्र प्रतिपूरक पोषक आहार, गैर औपचारिक पूर्व स्कूल शिक्षा, प्रतिरक्षण, स्‍वास्‍थ्‍य जांच एवं रेफरेल सेवाएं मुहैया कराते हैं। इनमें से पिछली तीन सेवाएं जन-स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली के समान दी जाती है।
      31.12.2012 की स्‍थिति के अनुसार सरकारी अपने भवनों/किराये पर/पक्‍के भवनों में चलाए जा रहे आंगनवाड़ी केंद्रों का उपलब्‍ध ब्‍यौरा नीचे दिया गया है:-

कच्‍चा
पक्‍का
कुल
कुल आंगनवाड़ी केंद्र और मिनी आंगनवाड़ी केंद्र जो रिपोर्ट कर रहे हैं
15.74%
84.26%
1203365
अपने
सरकारी अपने भवन
0.04%
30.04%
30.08%
किराये के
ए डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू एस/ए डब्‍ल्‍यूएचएस घर  
0.84%
4.40%
5.24%
अन्‍य
11.42%
16.23%
27.65%
सामुदायिक
स्‍कूल
0.00%
22.33%
22.33%
पंचायत
0.05%
3.89%
3.94%
अन्‍य
2.48%
7.10%
9.58%

खुला स्‍थान
0.91%
0.27%
1.18%
              
                                          ***
वि.कासोटिया/यादराम/सुजीत-785