Sunday, January 27, 2013

राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्र के नाम संदेश

25-जनवरी-2013 19:43 IST
देश का एक कानून है परंतु उससे ऊंचा भी एक कानून है
महिला की पवित्रता भारतीय सभ्यता का नीति निर्देशक सिद्धांत
महिला के साथ पाशविकता से सभ्यता की आत्मा लहुलुहान
64वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्‍या पर राष्‍ट्र के नाम संदेश का मूल पाठ इस प्रकार है:-
मेरे प्यारे देशवासियो :
चौंसठवें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मैं भारत में और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। मैं अपनी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध सैनिक बलों और आंतरिक सुरक्षा बलों को विशेष बधाई देता हूं।
भारत में पिछले छह दशकों के दौरान, पिछली छह सदियों से अधिक बदलाव आया है। यह न तो अचानक हुआ है और न ही दैवयोग से; इतिहास की गति में बदलाव तब आता है जब उसे स्वप्न का स्पर्श मिलता है। उपनिवेशवाद की राख से एक नए भारत के सृजन का महान सपना 1947 में ऐतिहासिक उत्कर्ष पर पहुंचा, और इससे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि स्वतंत्रता से राष्ट्र-निर्माण की नाटकीय कथा की शुरुआत हुई। इसकी आधारशिला, 26 जनवरी, 1950 को अंगीकृत हमारे संविधान के द्वारा रखी गई थी, जिसे हम प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। इसका प्रेरक सिद्धांत था, राज्य और नागरिक के बीच एक सहमति अर्थात न्याय, स्वतंत्रता तथा समानता के द्वारा पोषित सशक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी।
भारत ने अंग्रेजों से स्वतंत्रता इसलिए नहीं ली थी कि वह भारतीयों को आजादी से वंचित रखे। संविधान दूसरी आजादी का प्रतीक था और यह आजादी थी लिंग, जाति, समुदाय की गैर-बराबरी की घुटन से और उन दूसरी प्रकार की बेड़ियों से, जो हमें बहुत समय से जकड़े हुए थी।

इसने ऐसे क्रांतिकारी उद्विकास को प्रेरणा दी जिसने भारतीय समाज को आधुनिकता के मार्ग पर आगे बढ़ाया : समाज में क्रमिक उद्विकास के द्वारा बदलाव आया, क्योंकि हिंसक क्रांति भारतीय परिपाटी नहीं है। जटिल सामाजिक ताने-बाने में बदलाव पर अभी कार्य जारी है, और इसको कानून में समय-समय पर आने वाले सुधारों और जनमत की शक्ति से प्रेरणा मिलती रही है।

पिछले छह दशकों में ऐसा बहुत कुछ हुआ है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। हमारी आर्थिक विकास दर तीन गुना से अधिक हो गई है। साक्षरता की दर में चार गुना से अधिक वृद्धि हुई है। खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बाद अब हम खाद्यान्न के निर्यातक हैं। गरीबी की मात्रा में काफी कमी लाई गई है।  हमारी एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि लैंगिक समानता की दिशा में हमारा प्रयास है।

ऐसा किसी ने नहीं कहा कि यह कार्य आसान होगा। 1955 में अधिनियमित हिंदू संहिता विधेयक, जैसी पहली बड़ी कोशिश में जो समस्याएं आई थी, उनकी अलग कहानी है। यह महत्त्वपूर्ण कानून जवाहर लाल नेहरू तथा बाबा साहेब अंबेडकर जैसे नेताओं की अविचल प्रतिबद्धता से ही पारित हो पाया था। जवाहरलाल नेहरू ने बाद में इसे अपने जीवन की संभवत: सबसे बड़ी उपलब्धि बताया था। अब समय आ गया है कि हर-एक भारतीय महिला के लिए लैंगिक समानता सुनिश्चित की जाए। हम न तो इस राष्ट्रीय दायित्व से बच सकते हैं और न ही इसे छोड़ सकते हैं क्योंकि इसे नजरअंदाज करने की बहुत भारी कीमत चुकानी होगी। निहित स्वार्थ आसानी से हार नहीं मानते। इस राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने के लिए सिविल समाज तथा सरकार को मिल-जुलकर प्रयास करने होंगे।

प्यारे देशवासियो :
मैं आपको ऐसे समय पर संबोधित कर रहा हूं जब एक बहुत व्यापक त्रासदी ने हमारे प्रमाद को झकझोर डाला है। एक नव-युवती के नृशंस बलात्कार और हत्या ने, एक ऐसी महिला जो कि उदीयमान भारत की आकांक्षाओं का प्रतीक थी, हमारे हृदयों को रिक्तता से तथा हमारे मनों को क्षोभ से भर दिया है। हमने एक जान से कहीं अधिक कुछ खोया है; हमने एक सपना खो दिया है। यदि आज हमारे युवा क्षुब्ध हैं तो क्या हम अपने युवाओं को दोष दे सकते हैं?

देश का एक कानून है। परंतु उससे ऊंचा भी एक कानून है। महिला की पवित्रता भारतीय सभ्यता नामक समग्र दर्शन का नीति निर्देशक सिद्धांत है। वेद कहते हैं कि माता एक से अधिक हो सकती हैं; जन्मदात्री, गुरुपत्नी, राजा की पत्नी, पुजारी की पत्नी, हमें दूध पिलाने वाली और हमारी मातृभूमि। मां हमें बुराई और दमन से बचाती है, हमारे लिए जीवन और समृद्धि का प्रतीक है। जब हम किसी महिला के साथ पाशविकता करते हैं तो अपनी सभ्यता की आत्मा को लहुलुहान कर डालते हैं।

देश को अपनी नैतिक दिशा को फिर से निर्धारित करने का समय आ गया है। निराशावादिता को बढ़ावा देने के लिए कोई अवसर नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि निराशावाद नैतिकता को अनदेखा करता है। हमें अपनी अंतरात्मा में गहराई से झांकना होगा और यह पता लगाना होगा कि हमसे कहां चूक हुई है। समस्याओं का समाधान विचार-विमर्श तथा नजरियों में तालमेल से ढूंढ़ना होगा। लोगों को यह विश्वास होना चाहिए कि शासन भलाई का एक माध्यम है और इसके लिए हमें सुशासन सुनिश्चित करना होगा।

प्यारे देशवासियो :
हम दूसरे पीढ़ीगत बदलाव के मुहाने पर हैं; गांवों और कस्बों में फैले हुए युवा इस बदलाव के अग्रेता हैं। आने वाला समय उनका है। वे आज अस्तित्व संबंधी बहुत सी शंकाओं से ग्रस्त हैं। क्या तंत्र योग्यता को समुचित सम्मान देता है। क्या समर्थवान लालच में पड़कर अपना धर्म भूल चुके हैं। क्या सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पर भ्रष्टाचार हावी हो गया है। क्या हमारी विधायिका उदीयमान भारत का प्रतिनिधित्व करती है या फिर इसमें आमूल-चूल सुधारों की जरूरत है। इन शंकाओं को दूर करना होगा। चुने हुए प्रतिनिधियों को जनता का विश्वास फिर से जीतना होगा। युवाओं की आशंका और उनकी बेचैनी को, तेजी से, गरिमापूर्ण तथा व्यवस्थित ढंग से बदलाव के कार्य पर लगाना होगा।

युवा खाली पेट सपना नहीं देख सकते। उनके पास अपनी और राष्ट्र की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए रोजगार होना चाहिए। यह सच है कि हमने 1947 के बाद एक लम्बा रास्ता तय किया है, जब हमारे प्रथम बजट का राजस्व मात्र 171 करोड़ रुपये था। आज केन्द्र सरकार के संसाधन उस बूंद की तुलना में एक महासागर के समान हैं। परंतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कहीं आर्थिक विकास से प्राप्त लाभ पर, पिरामिड के शिखर पर बैठे भाग्यशाली लोगों का ही एकाधिकार न हो जाए। धन के सृजन का बुनियादी उद्देश्य हमारी बढ़ती जनसंख्या से भुखमरी, निर्धनता और अल्प आजीविका की बुराई को जड़ से खत्म करना होना चाहिए।

प्यारे देशवासियो :
पिछला वर्ष हम सभी के लिए परीक्षा का वर्ष रहा है। आर्थिक सुधारों के पथ पर अग्रसर होते हुए, हमें बाजार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं की वर्तमान समस्याओं के प्रति जागरूक रहना होगा। बहुत से धनी राष्ट्र अब सामाजिक दायित्व रहित अधिकार की संस्कृति के जाल में फंस गए हैं; हमें इस जाल से बचना होगा। हमारी नीतियों के परिणाम हमारे गांवों, खेतों, फैक्ट्रियों तथा स्कूलों और अस्पतालों में दिखाई देने चाहिए।

आंकड़ों का उन लोगों के लिए कोई अर्थ नहीं होता जिन्हें उनसे लाभ नहीं पहुंचता। हमें तत्काल काम में लगना होगा अन्यथा, वर्तमान में जिन अशांत इलाकों का प्राय: ‘नक्सलवादी’ हिंसा के रूप में उल्लेख किया जाता है उनमें और अधिक खतरनाक ढंग से विस्तार हो सकता है।

प्यारे देशवासियो :
अभी पिछले दिनों, नियंत्रण रेखा पर हमारे सैनिकों पर गंभीर नृशंसता के मामले सामने आए हैं। पड़ोसियों में मतभेद हो सकते हैं; सीमाओं पर तनाव एक सामान्य स्थिति हो सकती है। परंतु राज्य से इतर तत्त्वों के माध्यम से प्रायोजित आतंकवाद समूचे राष्ट्र के लिए भारी चिंता का विषय है। सीमा पर शांति में हमारा विश्वास है और हम सदैव दोस्ती की उम्मीद में हाथ बढ़ाने के लिए तैयार हैं। परंतु इस हाथ को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
प्यारे देशवासियो :
भारत की सबसे अजेय सम्पत्ति है उसका खुद में विश्वास। हमारे लिए प्रत्येक चुनौती, अभूतपूर्व आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता हासिल करने के हमारे सकंल्प को मजबूत बनाने का अवसर बन जाती है। इस संकल्प को, खासकर बेहतर और व्यापक शिक्षा पर भारी निवेश के द्वारा, मजबूत बनाना होगा। शिक्षा ऐसी सीढ़ी है, जो सबसे निचले पायदान पर मौजूद व्यक्तियों को व्यावसायिक और सामाजिक प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुँचा सकती है। शिक्षा ऐसा मंत्र है जो हमारे आर्थिक भाग्य को बदल सकता है और ऐसी दरारों को पाट सकता है जो समाज में असमानता पैदा करती हैं। अभी तक शिक्षा की यह सीढ़ी, अपेक्षित स्तर तक, उन लोगों तक नहीं पहुंची है जिनको इसकी सबसे अधिक जरूरत है। भारत द्वारा वर्तमान वंचितों को, आर्थिक विकास के बहुत से उपादानों में बदल कर अपनी विकास दर को दोगुना किया जा सकता है।

हमारे चौंसठवें गणतंत्र दिवस के अवसर पर यद्यपि चिंता का कोई कारण हो सकता है परंतु हताशा का कोई नहीं। यदि भारत में छह दशकों में पिछली छह सदियों के मुकाबले अधिक बदलाव आया है तो मैं आपसे वायदा करता हूं कि इसमें अगले दस वर्षों में, पिछले साठ वर्षों से ज्यादा बदलाव आएगा। भारत की शाश्वत जिजीविषा जागृत है।

अंग्रेजों को भी यह लगा था कि वे एक ऐसा देश छोड़कर जा रहे हैं जो उससे बहुत अलग है जिस पर उन्होंने आधिपत्य किया था। राष्‍ट्रपति भवन स्थित जयपुर स्तंभ की आधारशिला पर एक शिलालेख है :-

‘‘विचारों में आस्था... शब्दों में प्रज्ञा...
 कर्म में पराक्रम...
 जीवन में सेवा...
 अत: भारत महान बने’’
भारत की भावना प्रस्तर में उत्कीर्ण है।

जय हिंद!

                             ****      महामहिम का राष्ट्र के नाम संदेश
मीणा/वि. कासोटिया/कविता/सुनील-327

Thursday, January 24, 2013

अब पंचायतों के जरिए मिल रही है

17-जनवरी-2013 14:09 IST
महिलाओं की आवाज को  पहचान 
पंचायती राज पर विशेष लेख//डॉ. हृषिकेश पांडा*                                 
विकेन्द्रीकृत सरकार की जड़े ग्राम सभा में गहराई से समाई हुई है। इसके तहत ग्राम पंचायत का हर एक मतदाता इसका सदस्य होता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया, योजनाओं की सहमति, योजना को रद्द करने और लाभार्थियों के चयन में अपनी हिस्सेदारी कर सकता है। 

     ग्राम सभा को लगातार सामाजिक अंकेक्षण के लिए एक सुदृढ़ संस्थान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका कारण यह है कि ग्राम सभा में ऐसे लोग शामिल होते हैं जो योजनाओं और कार्यक्रमों के लाभार्थी होते हैं और जब कोई कार्य शुरु होता है तो वो कार्यस्थल पर उपस्थित होते हैं और इस हिसाब से वे योजनाओं और कार्य के क्रियान्वयन की गुणवत्ता का सबसे अच्छी तरह से आकलन सकते हैं। इसलिए सामाजिक अंकेक्षण के लिए ग्राम सभा सर्वोत्तम एजेंसी है।

ग्राम सभा के साथ समस्या यह है कि कई स्थानों पर उपस्थिति काफी कम होती है। अधिकांशतः पंचायतों द्वारा शुरु किए गए कामों का एजेंडा सीमित होता है इसलिए बैठक में भाग लेने की कोई रुचि कई लोगों में नहीं होती है। कई बार एक दिन की मजदूरी से हाथ धोने का डर होता है। ग्राम सभा में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए इसके पास समय होना चाहिए और साथ ही मुद्दों को व्यापक रुप में लिया जाना चाहिए। ये मुद्दे अधिकांश लोगों के हित से संबंधित होने चाहिए। जैसे कि- प्राथमिक विद्यालय, मध्याह्न भोजन, पेयजल प्रणाली, सीवर प्रणाली, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, आंगनवाडी और टीकाकरण सहित बाल एवं मातृत्व देखभाल कार्यक्रम। इनमें से अधिकतर समस्याओं का सामना महिलाएं करती हैं न कि पुरुष। इसलिए इन विषयों पर चर्चा तभी की जा सकती है जब महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी हो।

अन्य समस्याएं जो महिलाओं को प्रभावित करती हैं वे हैं- घर के प्रबंधन के लिए नकद आय और खाद्य सुरक्षा, जन वितरण प्रणाली खाद्य सुरक्षा का एक भाग है। खाद्य सामग्री का एक अन्य भाग है नकद सुरक्षा, कृषि, बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, हथकरघा आदि जैसी आर्थिक गतिविधियां। इसी से संबंधित अन्य गतिविधियों में सिंचाई, भूमि प्रबंधन, और मृदा संरक्षण शामिल है। ग्राम सभा द्वारा ऐसे कार्यक्रमों की प्रभावी निगरानी तभी संभव है जब ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं की भागीदारी पर्याप्त मात्रा में हो क्योंकि वे इन गतिविधियों की साक्षी होती हैं और पुरुषों की तुलना में खाद्य सुरक्षा का प्रबंधन उन्हें अधिकतर करना होता है। देश के अनेक भागों में महिलाओं की भागीदारी को हमेशा सुनिश्चित करना संभव नहीं होता क्योंकि वहां महिलाएं पुरुष के सामने कुछ नहीं बोलतीं। कई बार पुरुष चाहते हैं कि महिलाएं केवल घर का ही काम करें और बैठकों का हिस्सा न बनें क्योंकि उनके हिसाब से यह समय की बर्बादी है। इस दुश्चक्र के परिणामस्वरुप ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं की भागीदारी नगण्य हो जाती हैं, ग्राम सभा ऐसे मुद्दों को नहीं उठाती जो अधिकांश लोगों को प्रभावित करते हैं और महिलाओं की भागीदारी और भी कम होती चली जाती है। इस समस्या के निवारण के लिए पंचायती राज मंत्रालय राज्यों के साथ विशेष ग्राम सभा की बैठकों की बात उठा रही है जिसमें विषयों की व्यापकता हो।

अगस्त 2011 और फिर अगस्त 2012 में पोषण पर चर्चा के लिए विशेष ग्राम सभा बैठकों का आयोजन किया गया था। इन बैठकों में महिला और बाल देखभाल, स्वास्थ्य, स्वच्छता, पेयजल, जन वितरण प्रणाली, शिक्षा, मध्याह्न भोजन, कृषि, बागवानी, डेयरी, मत्स्यपालन आदि से संबंधित कार्यक्रम प्रमुखों ने हिस्सेदारी की। इन बैठकों में महिलाओं की अधिक भागीदारी रही और अधिकांश लोगों को, खासतौर पर महिलाओं को लाभ हुआ।

अक्तूबर 2012 के दौरान महिलाओं से संबंधित विशेष ग्राम सभा बैठक का आयोजन किया गया। इसमें आंगनवाडी केन्द्रों, स्वास्थ्य, स्वच्छता, पेयजल, महिलाओं और बच्चों के प्रति हिंसा पर रोक, दहेज और महिला भ्रूण हत्या पर रोकथाम जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। महिलाओं की उपस्थिति और भागीदारी को बढ़ाने के लिए राज्यों को ग्राम सभा में महिलाओं के लिए विशेष गणपूर्ति की व्यवस्था की सलाह दी गई है।

हालांकि इन प्रयासों के बावजूद यह आवश्यक है कि विभिन्न कारणों से महिला ग्राम सभा की बैठकें होना आवश्यक है। पहला, एक महिला ग्राम सभा की बैठक में महिलाओँ की उपस्थिति और भागीदारी ग्राम सभा की बैठक की तुलना में अधिक होती है। दूसरा, महिला ग्राम सभा की बैठकों में दहेज, घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, सार्वजनिक स्थानों पर हिंसा, महिला भ्रूण हत्या और महिला तथा बच्चों के व्यापार जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाया जाता है। महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्य महिला ग्राम सभा की बैठकों को ग्राम सभा की बैठकें करते आए हैं। हाल ही में राजस्थान, ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों ने महिला ग्राम सभाओं की बैठकों के आयोजन के लिए अधिसूचना जारी की है। हमारा अनुभव दर्शाता है कि ग्राम सभा की बैठकें अथवा महिला सभा की बैठकों में महिलों की अधिक भागीदारी से सिंचाई और जलाशयों के निर्माण जैसी एमजीनरेगा जैसी गतिविधियों में तेजी आती है और कृषि, बागवानी तथा चारा तथा पेयजल आपूर्ति में सुधार जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है।

पंचायती राज मंत्रालय ने राज्यों को विशेष ग्राम सभा और महिला सभा की बैठकों पर चर्चा की सलाह दी है ताकि कन्या भ्रूण हत्या जैसे महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जा सके। विषम बाल लिंग अनुपात और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर चर्चा का भी परामर्श दिया गया। जिन क्षेत्रों में महिला सभाओं का गठन नहीं हुआ है उन्हें इसका गठन करना चाहिए और बाल लिंग अनुपात के मुद्दे को उठाना चाहिए। आंगनवाडी की निगरानी समिति को पंचायत/वार्ड सदस्य के अधीन करने और ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण समिति को ग्राम पंचायत की उप-समति बनाने से पंचायतों के पास गर्भवती महिलाओं, बालक-बालिकाओं के जन्म और शिशु मृत्यु दर के पंजीकरण की सूचना होगी। इससे पंचायत जन्म के समय लिंगानुपात पर नजर रख सकेगी। मैंने ग्राम सभाओं, महिला सभाओं और पंचायत के चयनित प्रतिनिधियों की कार्यशालाओं की कई बैठकों में हिस्सा लिया है और देखा है कि महिलाएं किस प्रकार कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा उठाती है, इस मानसिकता के पीछे के असली कारणों की पहचान करती हैं (महिलाओं के प्रति अपराध एक प्रमुख मुद्दा है) और वे किस प्रकार इसका सामना करती हैं।

तदनुसार विभिन्‍न राज्‍यों में लैंगिक मुद्दों पर विशेष ग्राम सभाएं आयोजित हुईं। हरियाणा में 1 सितंबर, 2012 को जुलाना ब्‍लॉक में आयोजित एक कार्यक्रम में 1500 महिलाओं ने भाग लिया। सात ग्राम पंचायतों से लोगों ने इस कार्यक्रम का प्रतिनिधित्‍व किया। उन्‍होंने इस अवसर पर शपथ ली कि वे कन्‍या भ्रूण हत्‍या जैसे सामाजिक कृत्‍य को खत्‍म करने में अपने पूरा सहयोग देंगे। इन सात गांवों की महिलाओं ने सार्वजनिक व्‍यवस्‍था में महिलाओं की संख्‍या कम होने और बुजुर्गों के कल्‍याण के संबंध में मुख्‍य रूप से चर्चा की।

30 अक्‍टूबर, 2012 को दक्षिण अंडमान के नमुनाघर में लैंगिक मुद्दों पर विशेष ग्राम सभा आयोजित की गई। इसमें 30 महिलाओं और युवतियों ने भाग लिया। अन्‍य मुद्दों के साथ महिलाओं और बच्‍चों के प्रति हिंसा की रोकथाम, दहेज प्रथा और कन्‍या भ्रूण हत्‍या की रोकथाम पर भी चर्चा हुई। इस बैठक में लोगों ने महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर प्रभावी तरीके  से चर्चा के लिए महिला सभा आयोजित करने का फैसला भी किया।

5 मार्च, 2012 को केरल के अल्‍लपुझा जिले में मरारिकुला दक्षिण ग्राम पंचायत में महिलाओं पर हिंसा के बारे में पता लगाना के संबंध में एक बैठक हुई। लगभग 2000 लोगों, जिसमें अधिकतर महिलाएं थी ने भाग लिया। बैठक के दौरान महिलाओं पर अपराध के संबंध में मरारिकुला दक्षिण ग्राम पंचायत की सिफारिशों पर चर्चा हुई। इस ग्राम पंचायत विशेषकर सार्वजनिक जगहों और शैक्षिक संस्‍थानों में महिलाओं पर हुए अपराध का पता लगाया। ग्राम सभा ने इस संबंध में कुछ हल भी निकाले पुरूषों को लाभप्रद गतिविधियों में व्‍यस्‍त रखना, महिलाओं के लिए ऐसी गतिविधियां सुनिश्चित करना जिससे वे पैसा कमा सकें, हेल्‍पलाइन शुरू करना, स्‍कूलों में परामर्श की व्‍यवस्‍था शुरू करना ताकि बच्‍चों में विश्‍वास पैदा हो सके और वे हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठा सकें। केरल सरकार ने इस अवधारणा को अपनाया है और निर्भय कार्यक्रम के तहत राज्‍य में इसे शुरू करने की प्रक्रिया में है।

पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण से 1993 के बाद पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्‍व बढ़ा है।  इससे स्‍थानीय स्‍तर पर महिलाओं का राजनैतिक नेतृत्‍व बढ़ा है।  ग्राम सभा के महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाने के प्रयासों और महिला सभाओं के बनने से महिलाएं अधिक सशक्‍त हो रही हैं। देश के कुछ भागों में महिला ग्राम सभा की बैठकों में महिलाओं का जोश जो पहले न  के बराबर था, अब देखते बनता है।   (पसूका फीचर)
*डॉ. हृषिकेश पांडा: अपर सचिव, पंचायती राज मंत्रालय

मीणा/विजयलक्ष्मी/प्रियंका-16

Friday, January 18, 2013

महिला रत्नों का सम्मान

भारत को ब्रह्माण्ड़ गुरु की गरिमा वापस दिलाने का प्रयास 
दामिनी की जान हम नहीं बचा पाए उसके बाद इस तरह की घटनायों की मुक्कमल रोकथाम भी नहीं कर पाए लेकिन इस के बावजूद महिला सम्मान को लेकर एक आन्दोलन अवश्य खड़ा हुआ जो लगातार मजबूत हो रहा है। जहाँ एक और महिलायों और उनकी पौशाक को लेकर बहुत ज़िम्मेदार समझे जाने वाले लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं वहीँ इस नाज़ुक समय में महिलायों के समान को लेकर एक विशेष आयोजन भी हो रहा है। महिला रत्नों के सम्मान में आप अपने क्षेत्र की महिलायों के नामांकन भी भेज सकते हैं साथ ही आलेख, सुझाव, सहयोग और विज्ञापन भी। इस विशेष आयोजन में कर्मठसत्यानिष्ठ,  कर्तव्यनिष्ठ,  संघर्षशीलप्रतिभाशालीसमाजसेवीराष्ट्रहित  में कार्य करने वाली सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ सम्मान किया जायेगा। आयोजकों का कहना है कि विश्व सभ्यता की रक्षासुरक्षा एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति के विकास व विस्तार हेतु संकल्प के साथ इस हाभियान मे सहयोग करों सफलता आपके कदम चूमेंगी। आपका छोटा सा प्रयास भारत को विश्वगुरु ही नही वरन्
ब्रह्माण्ड़ गुरु की प्राचीन गरिमा वापस दिलाएगा। सम्पर्क   : भावना त्यागी भारतीय (011 22528272, 9013666652) और भू त्यागी भारतीय (विश्व चिंतक) (09999466822, 9013666651) आप अपने सुझाव यहाँ भी भेज सकते हैं जिन्हें आयोजकों तक पहुंचा दिया जायेगा।-- रेक्टर कथूरिया 

नामांकन आमन्त्रण महिला और मीडिया 2013 FFF.pdf
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Sunday, January 13, 2013

136 साल की उम्र में हसनो ने ली दुनिया से विदा

अब अफ़गानिस्तान में विश्व की सबसे वयोवृद्ध महिला का देहांत
                                     © Flickr.com/daoro/cc-by
वयोवृद्ध उम्र के दावे पहले भी होते रहे हैं। अब समाचार सामने आया है अफगानिस्तान का जहां विश्व की सबसे अधिक वयोवृद्ध उम्र की महिला का देहांत हो गया है। गौरतलब है कि इससे पूर्व भी ऐसे समाचार आते रहे हैं। कुछ ही समय पूर्व भी इसी तरह की खबर आई थी कि जापान में संसार की सबसे अधिक उम्र की महिला का देहांत हो गया है| इस खबर के मुताबिक कोतो ओकुबो नाम की यह महिला 115 वर्ष की थी अपने आखिरी दिनों में कावासाकी नगर के वृद्धाश्रम में रह रही थीं| पिछले साल 17 दिसंबर को अमरीका में 115 वर्षीया डायना मैनफ्रेडीनी की मृत्यु के बाद ओकुबो को संसार की सबसे वयोवृद्ध महिला माना गया था| डायना उनसे 264 दिन बड़ी थीं|
      इसी तरह जब जार्जिया के पश्चिम में स्थित साचिनो गांव में रह रही अन्तिसा ह्विचावा नाम की महिला का देहांत हुआ तो उस समय भी यही कहा गया कि अब दुनिया की वयोव्र्द्ध महिला इस संसार में नहीं रहीं| ख़बरों के मुताबिक वह इस देश की, और कुछ आंकड़ों के अनुसार तो, संसार की सबसे वयोवृद्ध महिला थीं| गत जुलाई में वह 132 वर्ष की हुई थीं| उन्हें उनके गांव में ही दफनाया गया है| हजारों लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी| इनमें उनके सगे-संबंधी, परिचित, गांववासी और आस-पड़ोस के गाँवों के लोग भी थे| अजीब इत्तफाक है कि जब उसका देहांत हुआ तो जार्जिया में  चुनाव-आदि की घटनाओं के कारण इस सबसे वयोवृद्ध महिला के निधन के समाचार की ओर स्थानीय संचार साधनों का समय से ध्यान ही नहीं गया| इसी कारण मृत्यु के कुछ दिन बाद ही इसकी खबर दुनिया में को  लग सकी। अब फिर एक वयोवृद्ध महिला के देहांत की खबर सामने आई है। 
      इससे पहले समझा जाता था कि विश्व की सबसे वयोवृद्ध महिला फ्रांस में रहती थीं। जॉना कल्मान नाम की इस महिला का सन् 1997 में 122 साल की उम्र में निधन हो गया था।  
     रेडियो रूस ने इस बार भी इस दिलचस्प खबर को प्रमुखता से उचित स्थान दिया है। रेडियो रूस के मुताबिक अफ़गानिस्तान में विश्व की सबसे वयोवृद्ध महिला हसनो का 136 साल की उम्र में निधन हो गया है। समाचार एजेंसी पजवाक की एक ख़बर के अनुसार, वर्दाक प्रांत के गवर्नर के प्रेस सचिव शहीदुल्ला शहीद ने, जो इस महिला के पोता हैं, बताया कि इस महिला के शव को शनिवार को नंगरहार प्रांत के एक गाँव में सपुर्दे-ख़ाक किया गया। शहीदुल्ला शहीद ने यह भी बताया कि इतनी बड़ी उम्र के बावजूद हसनो नमाज़ पढ़ने से पहले खुद ही स्नान कर लेती थीं।
136 साल की उम्र में हसनो ने ली दुनिया से विदा 
(रेडियो रूस से साभार       
अब अफ़गानिस्तान में विश्व की सबसे वयोवृद्ध महिला का देहांत
(13.01.2013, 13:51)

Saturday, January 5, 2013

महिलाओं और कमज़ोर वर्गों पर अपराध

04-जनवरी-2013 15:26 IST
कानूनों की उपयुक्‍तता का दोबारा मूल्‍यांकन करने की ज़रूरत:गृह मंत्री
केंद्रीय गृह मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि दिल्‍ली में हाल में हुई घटना और समाज में महिलाओं तथा कमज़ोर वर्गों के प्रति रोष को हमारे लोकतंत्र में स्‍वीकार नहीं किया जाएगा। श्री शिंदे आज नई दिल्‍ली में महिलाओं पर अपराधों तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के प्रति अत्‍याचारों पर मुख्‍य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के सम्‍मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्‍होंने कहा कि इसे सख्‍त कदमों से रोके जाने की ज़रूरत है। उन्‍होंने कहा कि समूची व्‍यवस्‍था, हमारे हितधारकों की भूमिका, हमारे कानूनों की उपयुक्‍तता का दोबारा मूल्‍यांकन करने की ज़रूरत है। उन्‍होंने कहा कि स्‍कूल के स्‍तर से ही तथा हमारे समाज के हाशिए पर आए सभी लोगों के बीच जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाने की ज़रूरत है। श्री शिंदे ने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा और रक्षा सरकार की जिम्‍मेदारी है। 

श्री शिंदे ने कहा कि सरकार तथा आपराधिक न्‍याय प्रणाली सहित कानून लागू करने वाली एजेंसियों की भूमिका के समक्ष महत्‍वपूर्ण चुनौती है। उन्‍होने कहा कि इस युग और समय में ज्ञान और समानता हमारे प्रशासन के मूल सिद्धांत हैं तथा ये हमारी सरकार और प्रशासन के लिए मापदंड का पैमाना होना चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि स्‍वतंत्रता के 60 वर्ष के बाद तथा विभिन्‍न कानून लागू करने के बाद भी महिलाओं और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आई है। उन्‍होंने कहा कि यह साफ है कि कानून हल का एक भाग है लेकिन बड़ी समस्‍या इसके कार्यान्‍वयन में आती है जहां कई बार ज़मीनी वास्‍तविकताएं इन कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करने में बाधा बन जाती हैं। हमारा मुख्‍य उद्देश्‍य ऐसी बाधाओं की पहचान करना, हमारे कानूनों तथा जांच की कार्य प्रणालियों और पद्धतियों में आवयक बदलावों के लिए सुझाव देना है ताकि सुनवाई जल्‍दी पूरी हो सके और अपराधी को समयबद्ध ढंग से सज़ा मिल सके। 

केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्‍णा तीरथ ने इस अवसर पर कहा कि राज्‍य सरकार के साथ विचार विमर्श की प्रक्रिया जल्‍दी से जल्‍दी पूरी हो जानी चाहिए। उन्‍होंने कहा कि उनके मंत्रालय ने इस संदर्भ में 28 दिसंबर, 2012 को सभी संबंधित व्‍यक्तियों के साथ भी विचार-विमर्श किया और प्रासंगिक कानूनों में शीघ्र बदलावों के लिए अपने सुझाव गृह मंत्रालय और न्‍यायमूर्ति वर्मा समिति को भेज दिए हैं। 

केंद्रीय सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्री कुमारी सैलजा ने कहा कि उनके मंत्रालय में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्‍याण और उनके प्रति अत्‍याचारों पर नज़र रखने के लिए प्रतिबद्ध व्‍यवस्‍था ने 20 बार बैठकें की हैं तथा गृह मंत्रालय से उनके लिए कल्‍याण योजनाएं लाने का आग्रह कर रही है। 

इस अवसर गृह राज्‍य मंत्री आर.पी.एन. सिंह, गृह राज्‍य मंत्री एम. रामाचंद्रन और गृह मंत्रालय, महिला और बाल कल्‍याण मंत्रालय तथा सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद थे। (PIB)

वि.कासोटिया /प्रियंका-53